S K Verma (अकिंचन/Joshuto

Indore, Madhya Pradesh, India

Basic schooling at St Joseph’s Higher Secondary School, completed Diploma in Civil and then passed Institution of Engineers (India) in Civil Engineering. Specialisation in Earthquake resistant design of Reinforced Concrete buildings. Served Government of India for 20+ years and taken voluntary retirement to embark upon long pending spiritual journey. Lived active social life, raising kids. Osho came in my life when Mr Chiman Singh Rathore, a telephone operator in local telecommunication department of Govt. of India visited my father wearing maroon robe in 1982 after taking sannyas from Osho and requested my father to do the same. I was witness of this whole conversation. He left 2-3 books of Osho on his table, and I started reading those books. I started practising the experiments that is suggested by Osho in those books and found very helpful too.
I kept reading his books and started practising Zen meditation from next year. After 10 years I came to know about awareness meditation and started practising it during brushing. This meditation is miraculous. It has changed me completely over a period of 20 years. After retirement I got first Philosia moment in 2017. It is also called as Satori in Japanese Zen. And in October 2021 I am able to experience separation of soul from body means beyond body experience. This experience helps one recognise life prior to that moment as futile running on a treadmill.
I started writing my experiences from March 2018, so that other people interested in spiritual journey could get benefit from my experiences as well as gain confidence that it happens and happening even today! So their efforts are not going to be in vain for sure- this confidence is a must to progress in this journey into the discovery of the unknown within.
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Osho says and I have same dream too:” Since I have become awakened, each moment, every hour, there is only one effort, only one endeavour, day and night only one attempt - that somehow I may be able to remind you of your forgotten treasure; that the declaration, “Ana’l Haq” can also arise from within you, that you can also say, “Aham Brahmasmi”, I am God.
God has been talked about in every corner of the world, but God has always remained far away, beyond the stars.
Only India has established that God is within man. And in realising the God within man, only India has given man the capability, the dignity and the beauty of he himself becoming the temple, the shrine.

How every being can become a temple, and how each being, in each moment, can become a prayer -this you can call my dream”- Osho

Whatever I am writing is not prose but poetry because I am writing is an out pouring from the depth of my heart.
Osho says: There are poets and there are poets. There are poets who compose poetry; they are composers. Their poetry is shallow. It is only a linguistic and grammatical game. They know the technique of how to create the fallacy of something being poetry. And there are poets who are not even aware of their poetry. They are not composers; but their hearts are so full of love and beauty and truth that whatever they say becomes poetry. It may have the form of prose; that does not matter.
You have to understand this: there are poems which have only the form of poetry, but they are really prose.
And there are pieces of prose which have the form of prose, but are really poetry.
Poetry and prose are not a question of form; it is a question of content. Even silence can be poetry.
Listen to this silence... this silence can defeat any Shakespeare, any Kalidas, any Milton.
These birds are not composing poetry. Just the beautiful sun and the beautiful trees are making them explode into singing. They don’t know the art of composing poetic pieces.
Do you think peacocks go to a school to learn dancing – kathak? – or cuckoos go to a school of music? What can a school of music teach a cuckoo? A cuckoo is already cuckoo enough.
Whatever your heart is pouring is poetry”

अंधे हाथी को देखने गए, यह सवाल उन्होंने न उठाया कि हमारे पास आंख भी है या नहीं–जो कि बुनियादी सवाल था।

हाथी का क्या करोगे? अगर आंख न होगी तो हाथी का क्या करोगे? मगर यही सभी अंधों की हालत है।

वह पंचतंत्र की कथा सिर्फ बच्चों के लिए नहीं है, खयाल रखना। बच्चे पढ़ते हैं, बूढ़ों को समझनी चाहिए। स्कूलों में पढ़ाई जाती है, पहली दूसरी, तीसरी कक्षा में वह कहानी पढ़ाई जाती है। वह कहानी पढ़ाई जानी चाहिए जब कोई विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण होने लगे, दीक्षांत के क्षण में।
क्योंकि उस कहानी में बड़ा राज है। उस कहानी में तो सारे धर्मों का सार छिपा है।

पांचों अंधे देखने चले हाथी को। बड़े प्रसन्न थे। बड़ी उमंग में थे। जिंदगी भर की आशा, अपेक्षा पूरी होने के करीब थी। मगर एक बात सोचना ही भूल गए कि हम अंधे हैं, देखेंगे कैसे? पहुंच भी गए।

हाथी को टटोला।

टटोलने और देखने में बड़ा फर्क है।

क्योंकि कुछ चीजें तो टटोली ही नहीं जा सकतीं, सिर्फ देखी ही जा सकती हैं।

अब जैसे तुम्हें रोशनी देखनी हो तो टटोल नहीं सकते। टटोलोगे तो क्या रोशनी हाथ लगेगी? टटोलने से पत्थर शायद हाथ लग जाए, मगर प्रकाश हाथ नहीं लगेगा। प्रकाश सूक्ष्म है, सूक्ष्मातिसूक्ष्म है।

तो हाथी तो बड़ा स्थूल था, हाथ लग गया।

मगर परमात्मा तो प्रकाश है, हाथ भी न लगेगा।

परमात्मा को टटोलोगे, कुछ का कुछ हाथ लग जाएगा।

परमात्मा को छोड़कर और कुछ भी हाथ आ जाएगा। परमात्मा तुम्हारी मुट्ठी में नहीं आ सकता।

परमात्मा कोई वस्तु नहीं है, जिसे तुम पकड़ लो।

फिर परमात्मा तो दूर, हाथी के साथ भी भूलें हो गईं! किसी ने सूंड़ पकड़ी। किसी ने पूंछ पकड़ी। किसी ने कान पकड़े। किसी ने पैर पकड़ा।

अंधे पूरे को नहीं देख सकते। टटोलने में अंश हाथ आता है।

इस बात को समझ लो; यह बड़ा वैज्ञानिक सूत्र हैं।

टटोलने में अंश हाथ आता है, देखने में पूर्ण हाथ आता है।

अगर तुम परमात्मा को टटोलोगे तो अंश हाथ आएगा; जैसे वैज्ञानिक कहता है: सिर्फ पदार्थ है और कुछ भी नहीं।
यह अंश हाथ में आ गया। पदार्थ परमात्मा का अंश है। लेकिन पदार्थ परमात्मा नहीं है।

जैसे मेरा पैर तुम्हारे हाथ में आ जाए। तो मेरा पैर मेरा पैर है, मगर मेरा पैर मैं नहीं हूं। मैं पैर से बड़ा हूं, ज्यादा हूं। परमात्मा में तो पदार्थ है, लेकिन परमात्मा बहुत बड़ा है, पदार्थ ही नहीं है। तुम परमात्मा और पदार्थ का तादात्म्य नहीं कर सकते।

लेकिन वैज्ञानिक अंधा है। उसके पास ध्यान की आंख नहीं है।

उसके पास अंतसचक्षु नहीं है। टटोल रहा है। उस टटोलने को वह प्रयोग कहता है; प्रयोग से टटोलना ही होगा।
योग से आंख खुलती है।
प्रयोग बाहर की तरफ जाता है, योग भीतर की तरफ जाता है।
प्रयोग बहिर्यात्रा है, योग अंतर्यात्रा है।
प्रयोग पदार्थ से जोड़ देगा, योग स्वयं से तोड़ देगा।

योग स्वयं से जोड़ देता है। और जिसने स्वयं को जान लिया, उसने सब जान लिया। क्योंकि स्वयं को जानने में खुलती है आंख और आंख खुलती है तो पूर्ण प्रकट हो जाता है।

काश, उन अंधों में से किसी की आंख खुल जाती तो पूर्ण प्रकट हो जाता या नहीं!
भला अंधा पूंछ पकड़े होता, अगर आंख खुल जाती तो तत्क्षण पूरा हाथी प्रकट हो जाता।

जो अंधा कान पकड़े था, और कह रहा था कि हाथी सूप की तरह होता है। जिसमें स्त्रियां अनाज साफ करती हैं, ऐसे सूप की भांति। अब हाथी का कान सूप जैसा लगा!

और जो अंधा पैर पकड़े था, उसने कहा, मंदिरों के जैसे स्तंभ होते हैं, ऐसा हाथी है।

लेकिन काश, पैर को पकड़े हुए आदमी की आंख खुल जाती, तो तत्क्षण पकड़े तो पैर होता, लेकिन पूरा हाथी दिखाई पड़ जाता!

वही आंख की कला है।
आंख के सामने पूर्ण प्रकट हो जाता।

हाथ की सीमा है, आंख की सीमा नहीं है।
कान की सीमा है, आंख की सीमा नहीं है।

आंख असीम को भी आत्मसात कर लेती है, इसलिए हमने जाननेवालों को आंखवाला कहा, द्रष्टा कहा।
और जानने की कला को दर्शन (Philosia) कहा।
और जानने की विधि को अंतर्दृष्टि कहा।

ये सब शब्द आंख से बने हैं। और ऐसा नहीं है कि भारत में ही ऐसा है; दुनिया में जितने भी शब्द बनाए गए हैं जाननेवाले के लिए वे सब आंख से बने हैं। जैसे अंग्रेजी में जाननेवाले को कहते हैं–सीअर, द्रष्टा। श्रोता नहीं कहते हैं। कान से नहीं बनाया शब्द। श्रोता नहीं कह सकते। कान की सीमा है।

आंख में सारी इंद्रियां समाहित हैं।

Formation of a Pearl is very similar to process of enlightenment of a person. Osho’s awareness meditation made all the difference in my life like a bivalve do for a drop of water. हंसा तो मोती चुगे।

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